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धीरे धीरे

धीरे धीरे मौसम सामान्य होता है धीरे धीरे क्रोध शान्त होता है धीरे धीरे ही छँटती है सुबह के कोहरे की धुंध। धीरे धीरे ही होता है प्यार का अहसास, धीरे धीरे ही समझ आती है प्यार की गहराई। पर नहीं ठहरता है गये हुए समय का विधान। आसान होता है कितना ढाढ़स देना किसी को उसकी क्षतिपूर्ति के लिए धैर्य रखें ,कहना जितना आसान है उतना ही कठिन है व्यक्तिगत रूप में वहन करना दर्द की पीड़ा को धीरे धीरे। । धीरे धीरे जवाँ होती है विचारों की जद्दोजहद , धीरे धीरे ही समझ आता है ज़माने की सहानुभूति की चादर का ओढ़ाया जाना। धीरे धीरे ही समझ आता है समझ पाना, किसी का किसी के द्वारा शोषित होते पाया जाना। धीरे धीरे ही समझ आता है स्वयं को बंधन मुक्त करने का गुण। धीरे धीरे संभलने का नाम ही है जीवन जीने की कला  creative topic

हंस की प्रकृति

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देश भक्त

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यदि मैं जादूगर होता

यदि मैं जादूगर होता,   काम अनेक कर जाता,  जादू की छड़ी घुमाकर   उलझन सुलझाता,  नाम अपना करवाता।  काम कोई भी होता,  स्कूल का होमवर्क,  या मम्मी का वर्क,  छड़ी घुमाकर  झटपट कर जाता|  न मम्मी की डाँट,  न पापा की फटकार,  मेरे काम हो जाते,  झटपट सरकार।  दोस्तों में हीरो होता,  सब पर धाक जमाता|  जादूगर के कारनामों से,  करता दिलों पर राज|  गिलि गिलि छू,  गिलि गिलि छू  चाँद को बस में  कर लेता यूँ,  गेंद बनाकर  कभी खेलता  कभी बिछौना बनाकर   सोता यूं   गिलि गिलि छू   गिलि गिलि छू।  सबके मन की  बात समझकर  संकट सबके  कर देता दूर ,  पूरी दुनिया मेरी  मित्र बन जाती  और मैं मम्मी  पापा का सपूत |

माँ

माँ मुझे बाँहों में भर लो दुनिया की सहानुभूति से डर लगता है। माँ मुझे हृदय से लगा लो प्यार की सच्ची गरमाहट को महसूस करना चाहती हूँ । थक गई हूँ बनावटी मुस्कान बिखराते हुए दम भर को सच्ची मुस्कान देखना चाहती हूँ। माँ तुम्हारे अंक में समा जाना चाहती हूँ। 

विचारों की जद्दोजहद

धीरे धीरे  मौसम सामान्य होता है  धीरे धीरे क्रोध शान्त होता है  धीरे धीरे ही छँटती है  सुबह के कोहरे की धुंध।  धीरे धीरे ही होता है  प्यार का अहसास,  धीरे धीरे ही समझ आती है प्यार की गहराई।  पर नहीं ठहरता है  गये हुए समय का विधान।  आसान होता है कितना  ढाढ़स देना किसी को  उसकी क्षतिपूर्ति के लिए , धैर्य रखें ,कहना जितना आसान है  उतना ही कठिन है  व्यक्तिगत रूप में वहन करना दर्द की पीड़ा को  धीरे धीरे। । धीरे धीरे जवाँ होती है  विचारों की जद्दोजहद , धीरे धीरे ही समझ आता है  ज़माने की सहानुभूति की  चादर का ओढ़ाया जाना।  धीरे धीरे ही समझ आता है  समझ पाना, किसी का किसी के द्वारा  शोषित होते पाया जाना।  धीरे धीरे ही समझ आता है  स्वयं को बंधन मुक्त करने का गुण।  धीरे धीरे संभलने का नाम ही है  जीवन जीने की कला ।

मान देना आसान नहीं

इतना भी आसान नहीं किसी को मान देना । इतना भी आसान नहीं किसी की तारीफ़ करना । मान देना व तारीफ़ करना आसान हो शायद, पर किसी को दिल से क्षमा करना इतना भीआसान नहीं।